गोपाल ज्ञानी

 




गोपाल ज्ञानी

..मैं एक गोपाल की बात कर चुका हूं ।यह उपनिषद में है ।

गायो का चौराहा अर्थात गायो को चरवाने वाला आत्मज्ञान पाने की लिए ऋषि को मिलता है ।ऋषि कहते है पहले तू कुछ शास्त्रो समज । यह गोपाल बहु कुछ जान कर वर्षो बाद ऋषि को ये ज्ञान अवगत कराने को जाता है ।ऋषि कहते है तुजे अभी भी बहोत शिखना होगा ।धर्मो धर्मग्रंथो को जान । फिर यह गोपाल इसमे भी की वर्ष निकाल कर ज्ञान प्राप्ति कर ऋषि को मिलता है ।फिरभी ऋषि उसे वेद को समझना कहते है ।बहु वर्ष बीते ऋषि के पास फिरसे पहोचता है । ऋषि मैं अब क्या करूँ ? ऋषि पूछते है । क्या तुम इन पेड़ों के पत्तो में वेद पढ़ सकते हो । अगर नही तो तुजे बहोत चिंतन करना जरूर है ।अब यह गोपाल चिंतन में खो जाता । कई वर्ष गुजर जाने के बात फिर  ऋषि के पास आता है ।ऋषि मैं अब क्या करूँ ? ऋषि पूछते है । क्या तुम इन पेड़ों के पत्तो में वेद पढ़ सकते हो । गोपाल जवाब देता है हा मैं चिंतन में खो गया हूं मुजे तो पेड़ में क्या आप मे भी सर्वत्र में वेद समज आ रहा है ।मैं स्वयं धन्य हु । अब क्या करूँ ? 

ऋषि हस कर बोले  यहां आने से पहले तू क्या करता था । जवाब दिया चिंतन ! फिर ऋषि ने प्रश्न पूछा इसके पहले तू क्या करता था । उसने जवाब दिया वेद पढता था ।..... अन्तमे उसे ज्ञान हुआ वह मैं तो गोपाल था । ऋषि ने कहा जा ओ फिरसे गाय चरवा ने का काम करो ।

यह उपनिषद का सार आता है । 

वैसे तो हजारों लाखों लोग है जिसे यह आध्यात्म ज्ञान नही है नही इनको जरूर लगी है ।पूर्ण रस से माया में खोए अपनी गाये  लेके घूम रहे है । इसे अज्ञानी कहो क्या? बस गोपाल को यही करना है । अब तो तेरे ये ही गुरु है ।गुरु अज्ञानी बन जाता है ।लेकिन ज्ञान के बाद ।

अज्ञानी में गुरु दिखाई देंगे । 


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