निद्रादि

जीवन यहां ही है और निद्रा भी !  मौत और जिंदगी  जीवन मे दिखाई देते है !! जिंदगी में डूबा हुआ दुसरो के जन्म और मौत को देखता है उससे खुद का अनुमान लगाकर जीता है !! ज्ञान से कीर्ति धन को समझ पाता है !! वह ज्ञान भी नाशवंत हो सकता है !! ज्ञान वान कीर्तिवान धनवान सभी को मृत्यु  खा जाता है !!
समज से संदेह नष्ट होता है ।संशय और संशोधन के साधन यहा ही बिखरे पड़े है ।वैज्ञानिके बन जाते है कई !! हजारो लाखो तारे  आकाश से आवाज़ दे रहे है । नाम दो ढूंढ़ो मुजे ।
अध्यात्म की दुनिया अद्भुत है ज्ञान और पैसे मिल तो जाते है किंतु खुद अंदर ही डूबता चला जाता है !! खो जाता है खुद ।खो देती है दुनिया!! समज नही पाती है ।
 दुनिया का रहस्य पा लेता है कोई सुनता नही है । जैसे रामानुज चिल्ला चिल्ला कर मंत्र बता रहा है । यहां याद आ जाता है चहचहाता अकेला पंखी । गा लेता है गीत ।
 बस इसका जवाब उपनिषद के गोपाल की वह बात सबकुछ जान लेने के बाद तो गैया ही चरवाने को जाना है ।


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